Thursday, February 24, 2011

मुंबई एक कटु सत्य

मुंबई एक कटु सत्य

मुंबई कहा जाता है बहुत से टापुओ को मिलाकर बनाया गया है और यहाँ के मूल निवासी कोली है, बाकी सब यदि कहा जाये तो पर प्रांतीय है जो यहाँ आकर बस गए, टापुओ को एक करके मुंबई को विह्रद रूप दे दिया गया, लगभग समानांतर चलने वाले भूभाग पर लोगो ने गगंचुम्बिया बिल्डिंग्स बना दी
इसे मामा मारीच की नगरी भी कहा जाता है जो की मायावी था इसीलिए शायद मुंबई का नाम मायानगरी पड़ गया, बहुत से लोग सपने लेकर आते है कुछ पूरा कर लेते है कुछ सपनो में जी जीते है और सपनो में ही चले जाते है, जो लोग मुंबई में रहते है उन्हें भागने की आदत सी पड़ी रहती है कई बार तो बच्चो को सिर्फ लंबा होते देखते रहते है थोडा यदि गणित किया जाये तो जो आदमी मुंबई में ४ घंटे ट्राफिक में बिताता है वो अमूनन महीने के ३ से चार दिन सिर्फ ट्राफिक में ही बिताता है एंड साल में करीब ४० दिन अत: छोटे शहरो की अपेक्छा मुंबई एम् आदमी ३६५ दिनों के बजाय ३२५ सिं जीवन जीता है! दूसरी और न तो पडोसी को जनता है न ही सड़क पर किसी की मदद कर पाता है

अब बात हो जाये थोड़े से व्यावसायिक दृष्टिकोण की, अपने ऑफिस के अलावा मै गरीब बच्चो के लिए कुछ सोशल प्रोग्राम करता हू मुंबई में और इस सिलसिले में मुझे कई अनुभव हुए, कुछ बहुत ही प्रोफेशनल लोगो ने बेबाक पूछा कितना पैसा दोगे आने का प्रोग्राम में वहीँ पर कुछ अच्छे इंसान जैसे डांस गुरु टेरेंस, जॉन अब्राहम, अमर उपाध्याय, राम मिश्र, सतीश कौशिक, कुलदीप सिंह जी, दिनेश कौशिक, कुमार प्रवेश, नकुल मेहता, सिद्धार्थ और सुहास इत्यादि लोगो ने परोक्छ और अपरोक्ष रूप से पूरा समर्थन दिया
चौराहों पर बच्चे भीख मांगते है, नारकीय जीवन भोगते है सडको पर लेकिन उसके बाद भी मुंबई आना नहीं छोड़ते.... उत्तरप्रदेश और बिहार के किसान जो यहाँ आकर सब्जी/दूध और ऑटो चलाते है उन्हें सिर्फ काम के कारण उसी स्तर का समझ लिया जाता है, कद काठी अच्छी होने के कारण सिक्यूरिटी सर्विसेस में अच्छा काम मिल जाता है, अक्सर तिवारी जी और शुक्ल जी आप किसी स्कूल के सिक्यूरिटी गार्ड में देख सकते है... सारे पेट्रोल पम्प पर आपको ये ही मिलेंगे लेकिन साहब मजाल है गाँव में कोई इन्हें गार्ड कह दे वहा ये दबंग कहलाये जाते है
यहाँ पर आगरा के आस पास से आये नवयुवक मालिश का काम करते है और कई बार कुछ और भी सेवाए देते है जिनका उल्लेख में नहीं करना चाहता, बातो में पता चला की गाँव में ये कह के आते है कि वो फिल्मो में काम करते है
लेकिन इन सब के बाद भी मुंबई में आम आदमी सुरछित रहता है और छोटे शहरो जैसे लोगो के व्यक्तिगत जीवन में बाकि व्यस्त नहीं होते है, कचरे के डब्बे में कचरा डालने कि कोशिश कि जाती है पान के दाग यदा कदा वाही देखने मिलते है जहा पर तथाकथित परप्रांतीय आते है और जाते है
आपके शहर को आप मुंबई से बेहतर बना सकते है, कोशिश करे और मुंबई में भीड़ न लगाये ...मै अपने छोटे शहर वापस जाऊंगा बस थोडा सा वक़्त है

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