मै एक लेखक हू और अपनी लिखने से कई रचनाये गढ़ता हू, बनाता हू कई सारे पात्र और निर्धारित करता हू उनके चरित्र, कई बार जिन्दगी की उठा पटक को रचना का हिस्सा बनाता हू या फिर एक काल्पनिक रचना करता हू जहा पर मेरा पात्र गरीबी से ऊपर उठकर असाधारण तरीके से एकदम दुनिया का बादशाह बन बैठता है, मै अच्छे आदमी को बुरा और बुरे आदमी को अच्छा बनाने की छमता रखता हू लेकिन ये सब मै अपनी रोजी रोटी के लिए करता हू, कई बार मुझे मेरे अन्दर का जमीर ललकारता भी है और मुझसे पूछता भी है कि क्या मै माँ सरस्वती के दिए गए आशीर्वाद को निभा पा रहा हू? लेकिन जब पेट अपना वीटो पॉवर का प्रयोग कर देता है तब सरे तर्क और वितर्क धरे के धरे रह जाते है. अब सोचता हू कि इतिहास के लेखाकारों ने यदि यही समझौता अपनी कलम से भी किया होगा तो हम जो आज के दौर मै पढ़ते है सही है? और सही था? प्रशन जहन मै इसीलिए आता है क्योकि मानव का स्वभाव नहीं बदला वो लालची पहले भी था और अब भी है, कलम का झुकाव चाहे वो न्यूज़ पेपर हो या टेलीविजन हर आदमी सुविधा के हिसाब से लिखता है कही पर विज्ञापन तो कंही पर निजी स्वार्थ जैसे पत्रकार कालोनी मै घर और प्रेस के लिए सरकारी जमीन
लेकिन कभी न कभी मै सच लिख ही डालता हू शायद वो या कुछ और सच्ची लेखनी ही कुछ परिवर्तन कर सके इस आडम्बरी दुनिया में, मेरा पात्र लगभग सफल होता है क्योकि जो सफल है वो ही सुना जाता है और देखा जाता है, असफल और असमर्थ के लिए शायद ये लागु नहीं होता
sahi kaha ... lekhani ka swabhaav parivartansheel hai .. aur use aisa hona padta hai .. kabhi pet ke liye to kabhi dil ke liye ...
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