मुंबई एक कटु सत्य
मुंबई कहा जाता है बहुत से टापुओ को मिलाकर बनाया गया है और यहाँ के मूल निवासी कोली है, बाकी सब यदि कहा जाये तो पर प्रांतीय है जो यहाँ आकर बस गए, टापुओ को एक करके मुंबई को विह्रद रूप दे दिया गया, लगभग समानांतर चलने वाले भूभाग पर लोगो ने गगंचुम्बिया बिल्डिंग्स बना दी
इसे मामा मारीच की नगरी भी कहा जाता है जो की मायावी था इसीलिए शायद मुंबई का नाम मायानगरी पड़ गया, बहुत से लोग सपने लेकर आते है कुछ पूरा कर लेते है कुछ सपनो में जी जीते है और सपनो में ही चले जाते है, जो लोग मुंबई में रहते है उन्हें भागने की आदत सी पड़ी रहती है कई बार तो बच्चो को सिर्फ लंबा होते देखते रहते है थोडा यदि गणित किया जाये तो जो आदमी मुंबई में ४ घंटे ट्राफिक में बिताता है वो अमूनन महीने के ३ से चार दिन सिर्फ ट्राफिक में ही बिताता है एंड साल में करीब ४० दिन अत: छोटे शहरो की अपेक्छा मुंबई एम् आदमी ३६५ दिनों के बजाय ३२५ सिं जीवन जीता है! दूसरी और न तो पडोसी को जनता है न ही सड़क पर किसी की मदद कर पाता है
अब बात हो जाये थोड़े से व्यावसायिक दृष्टिकोण की, अपने ऑफिस के अलावा मै गरीब बच्चो के लिए कुछ सोशल प्रोग्राम करता हू मुंबई में और इस सिलसिले में मुझे कई अनुभव हुए, कुछ बहुत ही प्रोफेशनल लोगो ने बेबाक पूछा कितना पैसा दोगे आने का प्रोग्राम में वहीँ पर कुछ अच्छे इंसान जैसे डांस गुरु टेरेंस, जॉन अब्राहम, अमर उपाध्याय, राम मिश्र, सतीश कौशिक, कुलदीप सिंह जी, दिनेश कौशिक, कुमार प्रवेश, नकुल मेहता, सिद्धार्थ और सुहास इत्यादि लोगो ने परोक्छ और अपरोक्ष रूप से पूरा समर्थन दिया
चौराहों पर बच्चे भीख मांगते है, नारकीय जीवन भोगते है सडको पर लेकिन उसके बाद भी मुंबई आना नहीं छोड़ते.... उत्तरप्रदेश और बिहार के किसान जो यहाँ आकर सब्जी/दूध और ऑटो चलाते है उन्हें सिर्फ काम के कारण उसी स्तर का समझ लिया जाता है, कद काठी अच्छी होने के कारण सिक्यूरिटी सर्विसेस में अच्छा काम मिल जाता है, अक्सर तिवारी जी और शुक्ल जी आप किसी स्कूल के सिक्यूरिटी गार्ड में देख सकते है... सारे पेट्रोल पम्प पर आपको ये ही मिलेंगे लेकिन साहब मजाल है गाँव में कोई इन्हें गार्ड कह दे वहा ये दबंग कहलाये जाते है
यहाँ पर आगरा के आस पास से आये नवयुवक मालिश का काम करते है और कई बार कुछ और भी सेवाए देते है जिनका उल्लेख में नहीं करना चाहता, बातो में पता चला की गाँव में ये कह के आते है कि वो फिल्मो में काम करते है
लेकिन इन सब के बाद भी मुंबई में आम आदमी सुरछित रहता है और छोटे शहरो जैसे लोगो के व्यक्तिगत जीवन में बाकि व्यस्त नहीं होते है, कचरे के डब्बे में कचरा डालने कि कोशिश कि जाती है पान के दाग यदा कदा वाही देखने मिलते है जहा पर तथाकथित परप्रांतीय आते है और जाते है
आपके शहर को आप मुंबई से बेहतर बना सकते है, कोशिश करे और मुंबई में भीड़ न लगाये ...मै अपने छोटे शहर वापस जाऊंगा बस थोडा सा वक़्त है
Thursday, February 24, 2011
Monday, February 21, 2011
आमिर अजमल कसाब एक नाम जो अब मजाक का पर्याय बन गया है हमारे हिन्दुस्तान में
आमिर अजमल कसाब एक नाम जो अब मजाक का पर्याय बन गया है हमारे हिन्दुस्तान में, हजारो लोगो ने सीधा प्रसारण देखा और मिया कसाब को गोली चलाते हुए निहारा, कसाब पकड़ा गया मुंबई पुलिस के जवानों द्वारा और उनमे से बहुत से बहादुरों की जाने भी गयी, २४ महीने से ज्यादा हो गए और अब बाते चल रही है कि क्या कसाब सुप्रीम कोर्ट जायेगा उसर उधर भी सजा बरक़रार रहने पर बिना हिन्दुस्तानी नागरिकता के बावजूद भारत के राष्ट्रपति से माफ़ी की गुहार लगाएगा? एक और जहा हर दिन शहीदों के परिवार कसाब के मृत्यु दंड की उम्मीद कर रहे है दूसरी ओर जनाब कसाब के जेल में ऐश चल रहे है, पकिस्तान पूरे जोर शोर से कसाब का अस्तित्व पकिस्तान से मिटाने में लगा है
हेडली हिन्दुस्तान आता है रेकी कर के चला जता है, १० दह्शदगर्द मुंबई में घुसते है और कई लोगो को मौत की नींद सुला देते है, पुलिस आये दिन घोषणा करती है आतंकी हमला कर सकते है लेकिन साहब मजाल कोई पकड़ा जाये, घोटाले बाजो की सरकार में तंत्र इतना खोखला हो चूका है कि शक होता है ये जरुरत पड़ने पर देश के काम आएंगे भी कि नहीं या फिर अपने विदेशी सूत्रों के सहारे हिन्दुस्तान को किसी और के हाथों गिरवी रख कर भाग जायेंगे
महानगरो में बढ़ता अपराध छोटे शहरो में पनपता भ्रस्टाचार और गाँवो में बढ़ता असंतोष किस ओर ले जा रहा है देश को? विदेशी तत्व हमारे देश में आकर हमारे देशद्रोही लोगो को छुड़ाने के लिए आन्दोलन करते है, मशरूम जैसे एन जी ओ की आड़ में देश तोड़ने की साजिश रखते है और कुछ हिंसा का सहारा लेकर जनजीवन को अस्त व्यस्त करते है
कौन है दोषी? सरकार या हम? समय है अभी निर्णय लेने का यदि सरकार है दोषी तो बदल डालो निकम्मी सरकार को लेकिन यदि हम है दोषी ऐसी निक्कमी सरकार चुनने के के बदलो अपनी सोच और सुधारो भविष्य अपनी मातृभूमि का, यदि सरकार कहती है की वो रक्षा नहीं कर सकती तो साफ़ करे और हथियारों के ऊपर से लाइसेंस पोलिसी हटा ले, चलने दे जंगल राज जो सशक्त होगा वो जी लेगा
लूटमार और चमचागिरी से पता नहीं कब फुर्सत मिलेगी हमारे नेताओं को, देश को गिरवी रखने वाले भेडियो से अब डट कर सामना करना होगा और संकल्प लेना होगा की हम सच्चाई के साथ पहले खुद रहना सीखेंगे, दिन दूर नहीं जब कसाब जैसे लोग जनता के फ़सलो का शिकार हो जाये
हेडली हिन्दुस्तान आता है रेकी कर के चला जता है, १० दह्शदगर्द मुंबई में घुसते है और कई लोगो को मौत की नींद सुला देते है, पुलिस आये दिन घोषणा करती है आतंकी हमला कर सकते है लेकिन साहब मजाल कोई पकड़ा जाये, घोटाले बाजो की सरकार में तंत्र इतना खोखला हो चूका है कि शक होता है ये जरुरत पड़ने पर देश के काम आएंगे भी कि नहीं या फिर अपने विदेशी सूत्रों के सहारे हिन्दुस्तान को किसी और के हाथों गिरवी रख कर भाग जायेंगे
महानगरो में बढ़ता अपराध छोटे शहरो में पनपता भ्रस्टाचार और गाँवो में बढ़ता असंतोष किस ओर ले जा रहा है देश को? विदेशी तत्व हमारे देश में आकर हमारे देशद्रोही लोगो को छुड़ाने के लिए आन्दोलन करते है, मशरूम जैसे एन जी ओ की आड़ में देश तोड़ने की साजिश रखते है और कुछ हिंसा का सहारा लेकर जनजीवन को अस्त व्यस्त करते है
कौन है दोषी? सरकार या हम? समय है अभी निर्णय लेने का यदि सरकार है दोषी तो बदल डालो निकम्मी सरकार को लेकिन यदि हम है दोषी ऐसी निक्कमी सरकार चुनने के के बदलो अपनी सोच और सुधारो भविष्य अपनी मातृभूमि का, यदि सरकार कहती है की वो रक्षा नहीं कर सकती तो साफ़ करे और हथियारों के ऊपर से लाइसेंस पोलिसी हटा ले, चलने दे जंगल राज जो सशक्त होगा वो जी लेगा
लूटमार और चमचागिरी से पता नहीं कब फुर्सत मिलेगी हमारे नेताओं को, देश को गिरवी रखने वाले भेडियो से अब डट कर सामना करना होगा और संकल्प लेना होगा की हम सच्चाई के साथ पहले खुद रहना सीखेंगे, दिन दूर नहीं जब कसाब जैसे लोग जनता के फ़सलो का शिकार हो जाये
सिर्फ राजधानी कहने से राजधानी नहीं होती है,
अक्सर रायपुर जाता हू छुट्टियों में लेकिन चूँकि परिवार के साथ रहता हू तो व्यावसायिक बातें सोच नहीं पता हू, काफी समय बाद व्यावसायिक कारणों से रायपुर आना हुआ, वो माल जो पहले मुझे मौज मस्ती का अड्डा लगता था मुझे गौरवान्वित करने लगा क्योकि एक बैंक के एम् डी वहां पर अपना ए टी एम लगवाने पहुंचे. लेकिन इस बार कुछ और भी देखा जो में आपको बताना चाहता हू, एक दिन पहले माल से वापस आते समय कुछ युवा बच्चो को सड़क पर मारपीट करते देखा जो मोटर साइकल सड़क के बीच लगाकर हाँथ पांव चला रहे थे, सडको पर ट्राफिक नियमो का उल्लंघन खुले आम दिखा, लोगो को थोड़ा भागते भी देखा जो एक बात का द्योतक है की राजधानी बन गया है शहर, अखबारों को देखा और सहसा सोचने पर बाध्य हुआ की अखबार आगे बढे या पीछे हो गए, कहीं न कहीं कोई एक कड़ी मुझे मिसिंग सी लगी, मेरे भाई पत्रकार बंधू जरा ध्यान दे और नाराज न हो क्योकि में आपके बीच में ही पला बढ़ा हू और थोडा सा अपने शहर के लिए भावुकता रखता हू, वेलेंटाइन मानते हुए महिलाओ का फोटो बड़ी प्राथमिकता से छापा गया प्रेम करना और व्यक्त करना बुराई नहीं लेकिन शहर में कुछ और भी अच्छा जरुर होता होगा जैसे ट्राफिक नियम का उल्लंघन करने वालो का फोटो और इनका परिचय दिया जाये, या फिर ये सोचा जाये कि छत्तीसगढ़ के विकास के लिए क्या किया जा सकता है मसलन बढती हुई महंगाई में क्या होगा और उधोग छेत्र में क्या चुनोतिया आ सकती है पर चर्चा कि जाये. हमारे शहर के बहुत से लोग बाहर शहरो में कार्यरत है, क्या हम उनमे से कुछ लोगो को छत्तीसगढ़ बुलवाकर औधोगिक विकास के बारे में या फिर कमजोर औद्योगिक इकैयो का कैसे पुनरोथान कर सकते है के बारे में विचार किया जाये. सड़के ख़राब है, धुल से सराबोर शहर लेकिन हम सब प्यार से राजधानी कहते है, रायपुर में भविष्य में आने वाले प्रोजेक्ट्स बहुत ही प्रोमिसिंग लग रहे है, एक बात बिलकुल तय है कि काफी गतिविधिया होंगी छत्तीसगढ़ में आने वाले समय में लेकिन क्या हम इसका सही फायदा उठाने में सक्षम है? या फिर हम अपने थोड़े थोड़े से हितो को ध्यान में रखकर काम कर रहे है? मै आव्हान करना चाहता हू उन सब का जो छत्तीसगढ़ कि पहचान भील और तीर कमान से ऊपर उठाकर हेदराबाद और बंगालुरू से करने मै मदद करे या फिर उनसे भी अच्छा बनाने मै मदद करे, संभव है लेकिन आप सब को आगे आना होगा और सोचना होगा हम क्या कर रहे है शहर के साथ. सिर्फ राजधानी कहने से राजधानी नहीं होती है, राजधानी मानने से राजधानी नहीं होती है? शहर को प्यार करने और उसके लोगो मै सिविक सेन्स बढ़ने से ही राजधानी तो क्या पूरे छत्तीसगढ़ को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी, बम्बई बाज़ार में जो यूरिनल है इतना बदबू मार रहा है जितना २५ साल पहले किसी टाकीज का बदबू मारता था, हमारे यहाँ सुना बहुत है कि रायपुर का मै सर्वश्रेष्ठ बिल्डर हू इत्यादि लेकिन भाइयो शहर में यदि कोई मेहमान आए और उसे इस तरह के यूरिनल मिले तो सोचिये क्या सोचेगा राजधानी के बारे में? उसके सामने एक नल कि टोंटी नहीं है पानी सडको पर बह रहा है क्यों भाई? सोचिये और एक सार्थक पहल का साथ दीजिये, सिर्फ नेताओं कि चाटुकारिता और बाहर से आने वाले लोगो से शहर गुलशन नहीं होगा, हमें शहर को कुछ देना होगा और वो है एक ईमानदार और सार्थक पहल, धन्यवाद्
सिर्फ राजधानी कहने से राजधानी नहीं होती है,
अक्सर रायपुर जाता हू छुट्टियों में लेकिन चूँकि परिवार के साथ रहता हू तो व्यावसायिक बातें सोच नहीं पता हू, काफी समय बाद व्यावसायिक कारणों से रायपुर आना हुआ, वो माल जो पहले मुझे मौज मस्ती का अड्डा लगता था मुझे गौरवान्वित करने लगा क्योकि एक बैंक के एम् डी वहां पर अपना ए टी एम लगवाने पहुंचे. लेकिन इस बार कुछ और भी देखा जो में आपको बताना चाहता हू, एक दिन पहले माल से वापस आते समय कुछ युवा बच्चो को सड़क पर मारपीट करते देखा जो मोटर साइकल सड़क के बीच लगाकर हाँथ पांव चला रहे थे, सडको पर ट्राफिक नियमो का उल्लंघन खुले आम दिखा, लोगो को थोड़ा भागते भी देखा जो एक बात का द्योतक है की राजधानी बन गया है शहर, अखबारों को देखा और सहसा सोचने पर बाध्य हुआ की अखबार आगे बढे या पीछे हो गए, कहीं न कहीं कोई एक कड़ी मुझे मिसिंग सी लगी, मेरे भाई पत्रकार बंधू जरा ध्यान दे और नाराज न हो क्योकि में आपके बीच में ही पला बढ़ा हू और थोडा सा अपने शहर के लिए भावुकता रखता हू, वेलेंटाइन मानते हुए महिलाओ का फोटो बड़ी प्राथमिकता से छापा गया प्रेम करना और व्यक्त करना बुराई नहीं लेकिन शहर में कुछ और भी अच्छा जरुर होता होगा जैसे ट्राफिक नियम का उल्लंघन करने वालो का फोटो और इनका परिचय दिया जाये, या फिर ये सोचा जाये कि छत्तीसगढ़ के विकास के लिए क्या किया जा सकता है मसलन बढती हुई महंगाई में क्या होगा और उधोग छेत्र में क्या चुनोतिया आ सकती है पर चर्चा कि जाये. हमारे शहर के बहुत से लोग बाहर शहरो में कार्यरत है, क्या हम उनमे से कुछ लोगो को छत्तीसगढ़ बुलवाकर औधोगिक विकास के बारे में या फिर कमजोर औद्योगिक इकैयो का कैसे पुनरोथान कर सकते है के बारे में विचार किया जाये. सड़के ख़राब है, धुल से सराबोर शहर लेकिन हम सब प्यार से राजधानी कहते है, रायपुर में भविष्य में आने वाले प्रोजेक्ट्स बहुत ही प्रोमिसिंग लग रहे है, एक बात बिलकुल तय है कि काफी गतिविधिया होंगी छत्तीसगढ़ में आने वाले समय में लेकिन क्या हम इसका सही फायदा उठाने में सक्षम है? या फिर हम अपने थोड़े थोड़े से हितो को ध्यान में रखकर काम कर रहे है? मै आव्हान करना चाहता हू उन सब का जो छत्तीसगढ़ कि पहचान भील और तीर कमान से ऊपर उठाकर हेदराबाद और बंगालुरू से करने मै मदद करे या फिर उनसे भी अच्छा बनाने मै मदद करे, संभव है लेकिन आप सब को आगे आना होगा और सोचना होगा हम क्या कर रहे है शहर के साथ. सिर्फ राजधानी कहने से राजधानी नहीं होती है, राजधानी मानने से राजधानी नहीं होती है? शहर को प्यार करने और उसके लोगो मै सिविक सेन्स बढ़ने से ही राजधानी तो क्या पूरे छत्तीसगढ़ को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी, बम्बई बाज़ार में जो यूरिनल है इतना बदबू मार रहा है जितना २५ साल पहले किसी टाकीज का बदबू मारता था, हमारे यहाँ सुना बहुत है कि रायपुर का मै सर्वश्रेष्ठ बिल्डर हू इत्यादि लेकिन भाइयो शहर में यदि कोई मेहमान आए और उसे इस तरह के यूरिनल मिले तो सोचिये क्या सोचेगा राजधानी के बारे में? उसके सामने एक नल कि टोंटी नहीं है पानी सडको पर बह रहा है क्यों भाई? सोचिये और एक सार्थक पहल का साथ दीजिये, सिर्फ नेताओं कि चाटुकारिता और बाहर से आने वाले लोगो से शहर गुलशन नहीं होगा, हमें शहर को कुछ देना होगा और वो है एक ईमानदार और सार्थक पहल, धन्यवाद्
Saturday, February 5, 2011
नक्काशी से क्रिकेट नहीं खेला जाता,
पाकिस्तानी क्रिकेट के तीन उभरते खिलाडी सट्टेबाजी में फस गए, कुछ साल पहले अज़हरुद्दीन और अजय जडेजा पर भी ये आरोप लगा था, साउथ अफ्रीका के हेंसी क्रोनिये और हर्शल गिब्स भी इस सट्टे के खेल में फस चुके थे, सवाल इस बात का नहीं है कि कौन फसा सवाल इस बात का है कि कैसे बचाए नादानों को ये गलती करने से? इस घटना से शर्मसार है हम सब क्योकि पकिस्तान भले ही अपंग देश है लेकिन कहीं न कहीं हमारी जड़ो से जुड़ा हुआ है, और हम सब इस बात से आहत है कि हमें अच्छे क्रिकेटर्स मिले लेकिन वो अपने लालच में फस गए, हमारे युवा इस बात पर ध्यान दे कि नक्काशी से क्रिकेट नहीं खेला जाता, क्रिकेट गरिमापूर्ण तरीके से खेला जाता है पैसे भले ही कम इज्जत कम नै होनी चाहिए इससे देश कि साख पर भी बट्टा लगता है
Friday, February 4, 2011
कुछ मुर्ख इमानदार अपनी करनी का फल भोगते रहते है
कॉर्पोरेट जगत जंगल से कम नहीं होता, इस जंगल का जानवर हमेशा इस फ़िराक में रहता है की कैसे किसी को अकारण मारा जाये और अपना प्रभुत्व कायम रखा जाये, यहाँ पर प्रमोशन के लिए अपने अधिकारी की जी हुजूरी एक अभिभाज्य हिस्सा होती है वही दूसरी और कुछ मुर्ख इमानदार अपनी करनी का फल भोगते रहते है और वो होती है स्वभिमानिता, इस जंगल में किसी जानवर को ये अधिकार नहीं है की वो अपना कद अपने अधिकारी से ऊपर रखे, इस जंगल के आदमी का पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर लगा रहता है की कैसे अपने कार्य को दोगुना और चारगुना कर के दिखाए जो न होते हुए भी मान लिया जाये, फिर मातहत और अधिकारी की मिलीभगत उन्हें बोनस के चार पैसे और ज्यादा दे जाये कुल मिलाकर आप देखेंगे की यहाँ पर काफी बड़े पैमाने पर बुध्धिजीवी दगाबाज बैठे रहते है जो अपने नियोक्ता के और अपने शेयरहोल्डर्स के हितो से समझौता करते है, कम्पनी का लाभ तो भाड़ में गया पहले अपना फायदा देखते है और अपने हिसाब से कम्पनी को लाभप्रद या बीमार करने की छमता रखते है, बड़े खतरनाक होते है ये लोग, आंकड़ो के जाल में अच्छे अच्छे लोगो को उलझाकर अपना हित साध लेते है. दौर इतना ख़राब है की आज ३० वर्ष की आयु के लोगो को हार्ट अटेक आने लगा है लेकिन इन्हें क्या...जरुरत है आप को इस बात को समझने की कि जान चाहिए या फिर बनना कॉर्पोरेट जगत का जंगली शिकार...आप सोचिये आखिर जीवन है आपका
Thursday, February 3, 2011
क्या मै माँ सरस्वती के दिए गए आशीर्वाद को निभा पा रहा हू?
मै एक लेखक हू और अपनी लिखने से कई रचनाये गढ़ता हू, बनाता हू कई सारे पात्र और निर्धारित करता हू उनके चरित्र, कई बार जिन्दगी की उठा पटक को रचना का हिस्सा बनाता हू या फिर एक काल्पनिक रचना करता हू जहा पर मेरा पात्र गरीबी से ऊपर उठकर असाधारण तरीके से एकदम दुनिया का बादशाह बन बैठता है, मै अच्छे आदमी को बुरा और बुरे आदमी को अच्छा बनाने की छमता रखता हू लेकिन ये सब मै अपनी रोजी रोटी के लिए करता हू, कई बार मुझे मेरे अन्दर का जमीर ललकारता भी है और मुझसे पूछता भी है कि क्या मै माँ सरस्वती के दिए गए आशीर्वाद को निभा पा रहा हू? लेकिन जब पेट अपना वीटो पॉवर का प्रयोग कर देता है तब सरे तर्क और वितर्क धरे के धरे रह जाते है. अब सोचता हू कि इतिहास के लेखाकारों ने यदि यही समझौता अपनी कलम से भी किया होगा तो हम जो आज के दौर मै पढ़ते है सही है? और सही था? प्रशन जहन मै इसीलिए आता है क्योकि मानव का स्वभाव नहीं बदला वो लालची पहले भी था और अब भी है, कलम का झुकाव चाहे वो न्यूज़ पेपर हो या टेलीविजन हर आदमी सुविधा के हिसाब से लिखता है कही पर विज्ञापन तो कंही पर निजी स्वार्थ जैसे पत्रकार कालोनी मै घर और प्रेस के लिए सरकारी जमीन
लेकिन कभी न कभी मै सच लिख ही डालता हू शायद वो या कुछ और सच्ची लेखनी ही कुछ परिवर्तन कर सके इस आडम्बरी दुनिया में, मेरा पात्र लगभग सफल होता है क्योकि जो सफल है वो ही सुना जाता है और देखा जाता है, असफल और असमर्थ के लिए शायद ये लागु नहीं होता
लेकिन कभी न कभी मै सच लिख ही डालता हू शायद वो या कुछ और सच्ची लेखनी ही कुछ परिवर्तन कर सके इस आडम्बरी दुनिया में, मेरा पात्र लगभग सफल होता है क्योकि जो सफल है वो ही सुना जाता है और देखा जाता है, असफल और असमर्थ के लिए शायद ये लागु नहीं होता
Wednesday, February 2, 2011
कागजो के अम्बार है यहाँ पर
कागजो के अम्बार है यहाँ पर
कहते है ये दस्तावेज रखने का कमरा है
धूल से ओत प्रोत फाइलों में बंद है किसी का इतिहास
या किसी का भविष्य जो इतिहास बनने से पहले उन हांथो में होगा
जो बिकते है पैसो के लिए, किसी गरीब के पेंशन के पेपर किसी की भविष्य निधि
टेबल लांघते लांघते लिफाफा पतला करते जाती है
उम्रदराज चेहरा लाचार सा बोझिल कदम चलते रहता है इस इंतज़ार में
कभी तो फाइल खुलेगी और मिलेगी मुक्ति इन रक्त पिचाशो से
लेकिन इंतज़ार हमेशा लम्बा होता है आँख में पट्टी बांधकर खुले आम सोता है
कहते है ये दस्तावेज रखने का कमरा है
धूल से ओत प्रोत फाइलों में बंद है किसी का इतिहास
या किसी का भविष्य जो इतिहास बनने से पहले उन हांथो में होगा
जो बिकते है पैसो के लिए, किसी गरीब के पेंशन के पेपर किसी की भविष्य निधि
टेबल लांघते लांघते लिफाफा पतला करते जाती है
उम्रदराज चेहरा लाचार सा बोझिल कदम चलते रहता है इस इंतज़ार में
कभी तो फाइल खुलेगी और मिलेगी मुक्ति इन रक्त पिचाशो से
लेकिन इंतज़ार हमेशा लम्बा होता है आँख में पट्टी बांधकर खुले आम सोता है
Tuesday, February 1, 2011
आप की दुनिया के ये दो मौलिक तत्व
इंसान के आगे बढ़ने की चाह उसे कभी कभी इतना मदांध कर देती है की उसे ये समझ में नहीं आता की गलत क्या है और सही क्या है, वो हर उस आदमी को अपना दुश्मन समझने लगता है जो उसे सही रस्ते पर चलने की प्रेरणा दे, वो अपने सारे गलत काम को सही साबित करने में हमेशा जुटा रहता है, लेकिन इन सारी कवायदों में वो यह भूल जाता है की उसका मूल कार्य क्या था और वो एक ऐसी दिशा में चला जाता है जिस पर उसे तात्कालिक सफलता तो मिलती है लेकिन उस रास्ते का अंत बहुत ज्यादा दूर नहीं होता. इस भौतिक भोगी दुनिया में आप सब खरीद सकते है लेकिन आपकी और परिवार की ख़ुशी नहीं, यदि आप की दुनिया के ये दो मौलिक तत्व आपकी जिन्दगी से गायब है तो मान लीजियेगा आप का जीवन नीरस है, जरुरी नहीं की जैसा आप सोचे वैसा ही आप पाए, कई बार आप अपने विचार के प्रश्न का उत्तर दूसरो के जबाब में ढूँडते है लेकिन जरुरी नहीं आप की विचार रचना से सब सहमत हो. यदि आप अपने विचारो की समीक्छा करते रहे और उसमे दूसरो का विचार शामिल करे तब शायद आप एक रचनात्मक सोच और विचार की और बढ सकते है. जीवन बहुत छोटा है प्यार करिए और ईर्ष्या और छल कपट से दूर रहिये वो ही आपको एक सुकून भरी नींद दे सकता है
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