Sunday, March 27, 2011

लगाओ रंगमंच के सेट बनाओ पूर्व खिलाडियों को उसका किरदार

करो टी आर पी के लिए नौटंकी
लगाओ रंगमंच के सेट बनाओ पूर्व खिलाडियों को उसका किरदार
करो घृणा की बाते और फेलाओ उन्माद
है न तुम्हारे लिए १६० करोड़ जनता हिन्दुस्तान और पकिस्तान की
बनो मदारी तुम और नचाओ आप जनता को सिर्फ एक खेल के कारण
दुआ करता हू की बेबस खिलाडी दोनों टीम के किसी दुर्घटना का शिकार न हो
तुमने तो अस्पताल में भी लाइव सेट चला रखे है
मेरा भारत मेरा है पकिस्तान भी कभी मेरा था
जो मेरा था अब गैर केसे हो गया ये समझ नहीं पाटा हु
एक तरफ चलाओ अमन की आशा के नाटक
दूसरी और फेलाओ नफरते दोनो ओर
मुद्दे गरीबी और आतंक के सुलगते रहे गुमशुदगी में सब तरफ
तुम्हारे यहाँ आतंक तो हमारे यहाँ भ्रस्ट्राचार चलो दोनों भूलते है इन्हें
तैयारी करे एक खेल की जिसके पीछे पूरी दुनिया पागल सी लगती है

Thursday, March 10, 2011

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर हक़ की जुबा न काटिए

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर हक़ की जुबा न काटिए आप का नाम याद था आपका नाम ले लिया" कितनी तार्किक थी ये बात, गाहे बगाहे आप उलझनों में पड़ जाते है, पूर्वाग्रह बहुत ख़राब होता है हर किसी को लगता है कि जो वो सोच रहा है वो सही है लेकिन वो ये नहीं जनता या जानना चाहता कि वास्तु स्थिति क्या है, कई बार हम अपने हिसाब से चरित्रों का मूल्यांकन करते है चाहे हम हमाम में कितने भी नंगे हो लेकिन दूसरों कि छीछा लेदर करने में या उसके बारे में अपना व्यक्तिगत कमेन्ट देने में नहीं हिचकिचाते, कुझे कही पर पढ़ी हुई एक बात याद आती है " एक बार ट्रेन में कुछ लोग ए सी काम्पर्टमेंट में यात्रा कर रहे थे, कोई पुस्तक पढ़ रहा था तो कोई गाने सुन रहा था, एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो एक आदमी दो बच्चो के साथ चढ़ा जो काफी रो रहे थे, ये चुपचाप बेठे लोगो को चुभा और उन्होंने इस व्यक्ति से कहा चुप करिए अपने बच्चो को, व्यक्ति ने गंभीरता से बड़े आर्त स्वर में जबाब दिया क्या करू, अस्पताल से आ रहा हू जहा पर अभी अभी इन बच्चो ने अपनी माँ को मरते देखा है कैसे चुप कराऊ आप बताइये" शर्मनाक उदाहरण हमारी मानसिक स्थिति का इससे बड़ा नहीं हो सकता.
ये बात मै यहाँ पर इसीलिए उल्लेखित कर रहा हू कि नेट पर हम एक दूसरे को जानते नहीं बस लिखने के और संवाद करने के आधार पर विश्वास पूर्वक दोस्त बना लेते है फिर उनके बारे मै अपनी विचारधारा व्यक्त करते है, हर व्यक्ति यहाँ पर बुरा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई पाक साफ़ है, इस दौर मै जब इंसान को एक अच्चा जरिया मिल रहा है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हमारी जबाबदारी बनती है कि हम अपनी भाषा और उसके सम्प्रेषण में बहुत ही सजग रहे, मुझे नेट पर कई बार कुछ ऐसा बोला गया जो मै नहीं हू लेकिन उन सब को मै माफ़ करता हू क्योकि उन्हें मै जनता नहीं और जिसे आप जानते नहीं उनकी बातो का बुरा क्या मानना, लेकिन एक बात और कहता हू यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सके तो उसका अपमान करने का हक़ आपको नहीं है, अक्सर पढता हू भाषा कभी कभी शालीन नहीं होती और वो ये बताती है कि आप किस कुल या परिवार से आते है और किन संस्कारों मै पाले बढे है
यदि आप कर सके तो इतना जरुर सोचे हम इंसान है और आपस मै हमें प्यार और स्नेह से रहना चाहिए और नहीं रह सकते तो एक दूसरे को भूल कर आगे बढ़ना चाहिए बिनी किसी गिले और शिकवे के, नफरत और पूर्वाग्रह आप को ही अपने अन्दर नष्ट करना होगा क्योकि ये आपके दिमाग कि उपज है

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए आप का नाम याद था आपका नाम ले लिया" कितनी तार्किक थी ये बात, गाहे बगाहे आप उलझनों में पड़ जाते है, पूर्वाग्रह बहुत ख़राब होता है हर किसी को लगता है कि जो वो सोच रहा है वो सही है लेकिन वो ये नहीं जनता या जानना चाहता कि वास्तु स्थिति क्या है, कई बार हम अपने हिसाब से चरित्रों का मूल्यांकन करते है चाहे हम हमाम में कितने भी नंगे हो लेकिन दूसरों कि छीछा लेदर करने में या उसके बारे में अपना व्यक्तिगत कमेन्ट देने में नहीं हिचकिचाते, कुझे कही पर पढ़ी हुई एक बात याद आती है " एक बार ट्रेन में कुछ लोग ए सी काम्पर्टमेंट में यात्रा कर रहे थे, कोई पुस्तक पढ़ रहा था तो कोई गाने सुन रहा था, एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो एक आदमी दो बच्चो के साथ चढ़ा जो काफी रो रहे थे, ये चुपचाप बेठे लोगो को चुभा और उन्होंने इस व्यक्ति से कहा चुप करिए अपने बच्चो को, व्यक्ति ने गंभीरता से बड़े आर्त स्वर में जबाब दिया क्या करू, अस्पताल से आ रहा हू जहा पर अभी अभी इन बच्चो ने अपनी माँ को मरते देखा है कैसे चुप कराऊ आप बताइये" शर्मनाक उदाहरण हमारी मानसिक स्थिति का इससे बड़ा नहीं हो सकता.
ये बात मै यहाँ पर इसीलिए उल्लेखित कर रहा हू कि नेट पर हम एक दूसरे को जानते नहीं बस लिखने के और संवाद करने के आधार पर विश्वास पूर्वक दोस्त बना लेते है फिर उनके बारे मै अपनी विचारधारा व्यक्त करते है, हर व्यक्ति यहाँ पर बुरा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई पाक साफ़ है, इस दौर मै जब इंसान को एक अच्चा जरिया मिल रहा है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हमारी जबाबदारी बनती है कि हम अपनी भाषा और उसके सम्प्रेषण में बहुत ही सजग रहे, मुझे नेट पर कई बार कुछ ऐसा बोला गया जो मै नहीं हू लेकिन उन सब को मै माफ़ करता हू क्योकि उन्हें मै जनता नहीं और जिसे आप जानते नहीं उनकी बातो का बुरा क्या मानना, लेकिन एक बात और कहता हू यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सके तो उसका अपमान करने का हक़ आपको नहीं है, अक्सर पढता हू भाषा कभी कभी शालीन नहीं होती और वो ये बताती है कि आप किस कुल या परिवार से आते है और किन संस्कारों मै पाले बढे है
यदि आप कर सके तो इतना जरुर सोचे हम इंसान है और आपस मै हमें प्यार और स्नेह से रहना चाहिए और नहीं रह सकते तो एक दूसरे को भूल कर आगे बढ़ना चाहिए बिनी किसी गिले और शिकवे के, नफरत और पूर्वाग्रह आप को ही अपने अन्दर नष्ट करना होगा क्योकि ये आपके दिमाग कि उपज है

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए आप का नाम याद था आपका नाम ले लिया" कितनी तार्किक थी ये बात, गाहे बगाहे आप उलझनों में पड़ जाते है, पूर्वाग्रह बहुत ख़राब होता है हर किसी को लगता है कि जो वो सोच रहा है वो सही है लेकिन वो ये नहीं जनता या जानना चाहता कि वास्तु स्थिति क्या है, कई बार हम अपने हिसाब से चरित्रों का मूल्यांकन करते है चाहे हम हमाम में कितने भी नंगे हो लेकिन दूसरों कि छीछा लेदर करने में या उसके बारे में अपना व्यक्तिगत कमेन्ट देने में नहीं हिचकिचाते, कुझे कही पर पढ़ी हुई एक बात याद आती है " एक बार ट्रेन में कुछ लोग ए सी काम्पर्टमेंट में यात्रा कर रहे थे, कोई पुस्तक पढ़ रहा था तो कोई गाने सुन रहा था, एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो एक आदमी दो बच्चो के साथ चढ़ा जो काफी रो रहे थे, ये चुपचाप बेठे लोगो को चुभा और उन्होंने इस व्यक्ति से कहा चुप करिए अपने बच्चो को, व्यक्ति ने गंभीरता से बड़े आर्त स्वर में जबाब दिया क्या करू, अस्पताल से आ रहा हू जहा पर अभी अभी इन बच्चो ने अपनी माँ को मरते देखा है कैसे चुप कराऊ आप बताइये" शर्मनाक उदाहरण हमारी मानसिक स्थिति का इससे बड़ा नहीं हो सकता.
ये बात मै यहाँ पर इसीलिए उल्लेखित कर रहा हू कि नेट पर हम एक दूसरे को जानते नहीं बस लिखने के और संवाद करने के आधार पर विश्वास पूर्वक दोस्त बना लेते है फिर उनके बारे मै अपनी विचारधारा व्यक्त करते है, हर व्यक्ति यहाँ पर बुरा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई पाक साफ़ है, इस दौर मै जब इंसान को एक अच्चा जरिया मिल रहा है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हमारी जबाबदारी बनती है कि हम अपनी भाषा और उसके सम्प्रेषण में बहुत ही सजग रहे, मुझे नेट पर कई बार कुछ ऐसा बोला गया जो मै नहीं हू लेकिन उन सब को मै माफ़ करता हू क्योकि उन्हें मै जनता नहीं और जिसे आप जानते नहीं उनकी बातो का बुरा क्या मानना, लेकिन एक बात और कहता हू यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सके तो उसका अपमान करने का हक़ आपको नहीं है, अक्सर पढता हू भाषा कभी कभी शालीन नहीं होती और वो ये बताती है कि आप किस कुल या परिवार से आते है और किन संस्कारों मै पाले बढे है
यदि आप कर सके तो इतना जरुर सोचे हम इंसान है और आपस मै हमें प्यार और स्नेह से रहना चाहिए और नहीं रह सकते तो एक दूसरे को भूल कर आगे बढ़ना चाहिए बिनी किसी गिले और शिकवे के, नफरत और पूर्वाग्रह आप को ही अपने अन्दर नष्ट करना होगा क्योकि ये आपके दिमाग कि उपज है

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए

दुष्यंत ने कहा था " बस इतनी सी बात पर जुबा न काटिए आप का नाम याद था आपका नाम ले लिया" कितनी तार्किक थी ये बात, गाहे बगाहे आप उलझनों में पड़ जाते है, पूर्वाग्रह बहुत ख़राब होता है हर किसी को लगता है कि जो वो सोच रहा है वो सही है लेकिन वो ये नहीं जनता या जानना चाहता कि वास्तु स्थिति क्या है, कई बार हम अपने हिसाब से चरित्रों का मूल्यांकन करते है चाहे हम हमाम में कितने भी नंगे हो लेकिन दूसरों कि छीछा लेदर करने में या उसके बारे में अपना व्यक्तिगत कमेन्ट देने में नहीं हिचकिचाते, कुझे कही पर पढ़ी हुई एक बात याद आती है " एक बार ट्रेन में कुछ लोग ए सी काम्पर्टमेंट में यात्रा कर रहे थे, कोई पुस्तक पढ़ रहा था तो कोई गाने सुन रहा था, एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो एक आदमी दो बच्चो के साथ चढ़ा जो काफी रो रहे थे, ये चुपचाप बेठे लोगो को चुभा और उन्होंने इस व्यक्ति से कहा चुप करिए अपने बच्चो को, व्यक्ति ने गंभीरता से बड़े आर्त स्वर में जबाब दिया क्या करू, अस्पताल से आ रहा हू जहा पर अभी अभी इन बच्चो ने अपनी माँ को मरते देखा है कैसे चुप कराऊ आप बताइये" शर्मनाक उदाहरण हमारी मानसिक स्थिति का इससे बड़ा नहीं हो सकता.
ये बात मै यहाँ पर इसीलिए उल्लेखित कर रहा हू कि नेट पर हम एक दूसरे को जानते नहीं बस लिखने के और संवाद करने के आधार पर विश्वास पूर्वक दोस्त बना लेते है फिर उनके बारे मै अपनी विचारधारा व्यक्त करते है, हर व्यक्ति यहाँ पर बुरा नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई पाक साफ़ है, इस दौर मै जब इंसान को एक अच्चा जरिया मिल रहा है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हमारी जबाबदारी बनती है कि हम अपनी भाषा और उसके सम्प्रेषण में बहुत ही सजग रहे, मुझे नेट पर कई बार कुछ ऐसा बोला गया जो मै नहीं हू लेकिन उन सब को मै माफ़ करता हू क्योकि उन्हें मै जनता नहीं और जिसे आप जानते नहीं उनकी बातो का बुरा क्या मानना, लेकिन एक बात और कहता हू यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सके तो उसका अपमान करने का हक़ आपको नहीं है, अक्सर पढता हू भाषा कभी कभी शालीन नहीं होती और वो ये बताती है कि आप किस कुल या परिवार से आते है और किन संस्कारों मै पाले बढे है
यदि आप कर सके तो इतना जरुर सोचे हम इंसान है और आपस मै हमें प्यार और स्नेह से रहना चाहिए और नहीं रह सकते तो एक दूसरे को भूल कर आगे बढ़ना चाहिए बिनी किसी गिले और शिकवे के, नफरत और पूर्वाग्रह आप को ही अपने अन्दर नष्ट करना होगा क्योकि ये आपके दिमाग कि उपज है